Sunday, 1 March 2026
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‘बॉर्डर’ की वो मासूम दुल्हन, सिर्फ 1 गाने से बनी थी नेशनल क्रश, फिल्मी दुनिया छोड़ क्यों चुनी गुमनामी की राह?


नई दिल्ली. साल 1997 में फिल्म बॉर्डर रिलीज हुई थी. जब यह मूवी सिनेमाघरों में आई, तब सिर्फ युद्ध के धमाके या सनी देओल की दहाड़ ही लोगों के जेहन में नहीं बसी थी. उस धमाके और शोर के बीच एक बहुत ही शांत और मासूम चेहरा भी था, जिसने दर्शकों के दिल पर गहरी छाप छोड़ी. हम जिनकी बात कर रहे हैं, उनका नाम है शरबानी मुखर्जी. उन्होंने बॉर्डर फिल्म में सुनील शेट्टी की मासूम पत्नी फूलवती का किरदार निभाया था.

‘बॉर्डर’ के ऐ जाते हुए लम्हों गाने ने शरबानी मुखर्जी को रातों-रात नेशनल क्रश बना दिया था. भले ही वह फिल्म में बस कुछ ही सीन में दिखी थीं, लेकिन उनकी बोलती आंखों और सादगी भरे अंदाज ने हर किसी का दिल जीत लिया. शरबानी उसी फिल्मी परिवार से आती हैं, जिससे काजोल और रानी मुखर्जी जुड़ी हैं. इन तीनों के पिता सगे भाई हैं. जब 1997 में शरबानी ने फिल्म बॉर्डर से अपना डेब्यू किया था, तब काजोल पहले से ही एक बड़ी स्टार बन चुकी थीं, वहीं रानी मुखर्जी ने भी लगभग उसी समय अपने करियर की शुरुआत की थी.

बॉलीवुड में शरबानी मुखर्जी ने को नहीं मिली पहचान

‘बॉर्डर’ की जबरदस्त कामयाबी के बाद शरबानी मुखर्जी एक इंडिपेंडेंट म्यूजिक वीडियो ‘घर आजा सोनिया’ में समीर सोनी के साथ नजर आईं. यह गाना उस वक्त बहुत पॉपुलर हुआ और आज भी लोग इसे पसंद करते हैं. हालांकि, इस पॉपुलैरिटी के बावजूद शरबानी को हिंदी फिल्मों में वैसी लंबी और बड़ी कामयाबी नहीं मिल पाई जैसी उम्मीद की जा रही थी.

शरबानी मुखर्जी ने भोजपुरी सिनेमा में भी किया काम

‘बॉर्डर’ के बाद शरबानी मुखर्जी ने ‘मिट्टी’, ‘अंश’, ‘कैसे कहूं कि प्यार है’ और ‘अनजाने’ जैसी फिल्मों में काम किया. लेकिन बदकिस्मती से इनमें से कोई भी फिल्म उन्हें बॉलीवुड की टॉप स्टार्स की लिस्ट में जगह नहीं दिला पाई. हैरानी की बात तो ये है कि उन्होंने ‘धरती कहे पुकार के’ नाम की भोजपुरी फिल्म में भी काम किया, जिसमें उनके साथ अजय देवगन और मनोज तिवारी जैसे सितारे थे. फिल्म तो सुपरहिट रही, लेकिन इसके बाद शरबानी ने कभी दोबारा भोजपुरी फिल्मों का रुख नहीं किया.

मलयालम सिनेमा में मिली असली पहचान

शरबानी ने ‘राकिलीपट्टू’ से मलयालम सिनेमा में डेब्यू किया था, जिसमें उनके साथ ज्योतिका और तब्बू जैसी बड़ी एक्ट्रेसेस थीं. लेकिन उनके करियर का असली टर्निंग पॉइंट 2010 की फिल्म ‘सूफी परंजा कथा’ साबित हुई. ‘बॉर्डर’ के करीब 12 साल बाद जाकर शरबानी को एक ऐसा रोल मिला, जिसके लिए क्रिटिक्स और दर्शकों ने उनकी एक्टिंग की जमकर तारीफ की. फिल्म में उन्होंने ‘कार्थी’ नाम की एक ऊंची जाति की हिंदू महिला का किरदार निभाया था, जो एक मुस्लिम शख्स के साथ भाग जाती है. केपी रामनुन्नी के उपन्यास पर आधारित इस रोल को उन्होंने बहुत इतनी संजीदगी से निभाया.

शरबानी मुखर्जी की आखिरी फिल्म

उसी साल शरबानी मुखर्जी एक और बेहतरीन मलयालम फिल्म आत्मकथा में नजर आईं. इस फिल्म को केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड्स में स्पेशल जूरी अवॉर्ड’ समेत कई बड़े सम्मान मिले. हैरानी की बात यह है कि ‘आत्मकथा’ शरबानी मुखर्जी की आखिरी फिल्म साबित हुई. जब उनकी एक्टिंग की हर तरफ चर्चा होने लगी थी, तभी उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली.



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