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इतिहास गवाह है कि बॉलीवुड में कोई भी गद्दी हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रहती. राजेश खन्ना की जादुई सफलता के बाद, जब अमिताभ बच्चन ने अपना राज कायम किया तो ऐसा लगा कि यह ट्रेंड कभी खत्म नहीं होगा. लेकिन 1980 के दशक के आखिर में, जब ‘एंग्री यंग मैन’ का दौर खत्म हो रहा था, अनिल कपूर एक नए सूरज की तरह उभरे. ‘तेजाब’ और ‘मिस्टर इंडिया’ के साथ, वह अभी गद्दी पर बैठे ही थे कि 3 नए एक्टर सलमान, आमिर और शाहरुख बॉलीवुड में आए, जिन्होंने न केवल अनिल कपूर की किस्मत खराब की, बल्कि सुपरस्टारडम का माहौल भी बदल दिया.
नई दिल्ली. 1969 से 1972 तक राजेश खन्ना का दौर भारत के पहले ऑफिशियल सुपरस्टार का दौर था. लेकिन 1973 में ‘जंजीर’ के साथ, अमिताभ बच्चन नाम का एक तूफान आया. अमिताभ की ‘एंग्री यंग मैन’ इमेज राजेश खन्ना की रोमांटिक अपील पर भारी पड़ने लगी. कुछ ही समय में राजेश खन्ना का दौर खत्म हो गया और अमिताभ बच्चन बॉलीवुड के ‘शहंशाह’ बन गए. लगभग 15 सालों तक, अमिताभ बच्चन ने इस तरह से राज किया जैसा इंडियन सिनेमा ने पहले कभी नहीं देखा था. (तस्वीर बनाने में ली गई है AI की मदद.)
1980 के दशक के बीच तक, अमिताभ बच्चन की कुछ फिल्में (जैसे ‘जादूगर’, ‘तूफान’ और ‘गंगा जमुना सरस्वती’) बॉक्स ऑफिस पर वैसी सफलता हासिल नहीं कर पा रही थीं, जिसके लिए वे जाने जाते थे. लगभग इसी समय, अमिताभ बच्चन के पॉलिटिक्स में आने से सिल्वर स्क्रीन पर एक खालीपन आ गया. इंडस्ट्री बच्चन के रिप्लेसमेंट की तलाश में थी.
इसी समय के दौरान अनिल कपूर ने खुद को स्थापित करना शुरू किया. 1984 की ‘मशाल’ और 1987 की ‘मिस्टर इंडिया’ ने उन्हें रेस में सबसे आगे कर दिया. 1988 की ‘तेजाब’ ने अनिल कपूर का अगला नंबर 1 के तौर पर स्टेटस पक्का कर दिया. उनका स्टाइल, डायलॉग और करिश्मा युवाओं के बीच बहुत पॉपुलर हो गए. अनिल कपूर ने वो कर दिखाया था जो उस समय के दूसरे एक्टर, जैसे जैकी श्रॉफ या सनी देओल नहीं कर पाए थे. उन्हें अमिताभ बच्चन का सक्सेसर माना जाने लगा था.
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अनिल कपूर का रास्ता साफ लग रहा था, लेकिन फिर 1988 और 1989 में दो फिल्में रिलीज हुईं जिन्होंने बॉलीवुड का रास्ता बदल दिया. ये दो लेजेंड थे आमिर खान और सलमान खान. ‘कयामत से कयामत तक’ के साथ, आमिर ने वह ‘चॉकलेटी रोमांस’ वापस लाया जो अमिताभ के जमाने में भुला दिया गया था. वहीं, ‘मैंने प्यार किया’ की सफलता ने अनिल कपूर की ‘एक्शन मसाला’ इमेज के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी.
इन दो एक्टर्स की सफलता ने अनिल कपूर के अकेले राज करने के सपने को चुनौती दी. लेकिन असली लूट अभी बाकी थी. अनिल कपूर अभी भी खान जोड़ी के साथ डील कर रहे थे, जब 1992 में एक और दिग्गज शाहरुख खान सीन में आए. शाहरुख ने ‘डर’ और ‘बाजीगर’ जैसे एंटी-हीरो रोल से दर्शकों का दिल जीता. फिर 1995 में ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ ने यह साफ कर दिया कि बॉलीवुड का नया ‘बादशाह’ कौन है.
अचानक, अनिल कपूर जो कुछ साल पहले नंबर 1 की रेस में सबसे आगे थे, अब 90 के दशक के इन नए स्टार्स के सामने ‘सीनियर’ माने जाने लगे. सलमान, आमिर और शाहरुख की तिकड़ी (बाद में अक्षय कुमार और अजय देवगन भी शामिल हुए) ने इतना मजबूत किला बनाया कि सोलो लीड के तौर पर अनिल कपूर का स्टारडम धीरे-धीरे फीका पड़ने लगा.
जहां राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन को अपने स्टारडम के कम होने से मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वहीं अनिल कपूर ने एक अलग रास्ता चुना. जब उन्होंने देखा कि कुछ अन्य दिग्गज लीड रोल हथिया रहे हैं, तो उन्होंने खुद को फिर से बनाया. उन्होंने कैरेक्टर रोल और वर्सेटाइल कैरेक्टर (जैसे- ‘विरासत’ और ‘पुकार’) की ओर रुख किया. हालांकि बाद में अमिताभ बच्चन ने भी धमाकेदार वापसी की और तब तक भी अनिल कपूर इंडस्ट्री में एक ‘कैरेक्टर’ इमेज से सेटल हो चुके थे.
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