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What is Sciatica Pain? Treatment & Precautions; Lower Back Pain Reason


4 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी

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सायटिका कमर दर्द से जुड़ी एक कॉमन समस्या है। इसमें शरीर की सबसे लंबी और मोटी नर्व ‘सायटिक नर्व’ पर दबाव पड़ने के कारण कमर से पैर तक दर्द होता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, विश्व में 13-40% लोगों को पूरी जिंदगी में कभी-न-कभी सायटिका की समस्या होती है। जबकि हर साल दुनिया के 1-5% लोगों को इस समस्या का सामना करना पड़ता है।

पूरी दुनिया में यह लोअर बैक पेन का बड़ा कारण है। सिडेंटरी लाइफस्टाइल, लंबे समय तक बैठकर काम करने की मजबूरी और गलत पोश्चर के कारण आने वाले समय में इसके मामले और बढ़ सकते हैं।

इसलिए फिजिकल हेल्थ में आज सायटिका की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • इसके क्या लक्षण हैं?
  • सायटिका की समस्या क्यों होती है?
  • इससे कैसे बचाव कर सकते हैं?

सवाल- सायटिका क्या होता है? यह कॉमन कमर दर्द से अलग कैसे है?

जवाब- हमारे शरीर में अरबों नर्व्स होती हैं। ये शरीर की कम्युनिकेशन लाइन हैं। ये दिमाग और शरीर के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने का काम करती हैं। शरीर की सबसे लंबी और मोटी नर्व सायटिक है। यह कमर से शुरू होकर कूल्हे, जांघ, घुटने और पिंडली से होते हुए पैर के तलवे तक जाती है।

जब इसमें किसी कारण से अतिरिक्त दबाव पड़ता है तो दर्द होता है। इसे सायटिकी कहते हैं। यह कोई बीमारी नहीं है। यह नर्व पर दबाव पड़ने से उभरा एक लक्षण है। कॉमन कमर दर्द और इसमें ये फर्क है कि कमर दर्द सिर्फ कमर तक सीमित रहता है, जबकि इसका दर्द कमर से शुरू होकर पैर के तलवे तक फैलता है।

सवाल- सायटिका का दर्द कैसा महसूस होता है?

जवाब- सायटिका का दर्द जलन, करंट के झटके या तेज चुभन जैसा होता है। यह दर्द कमर के निचले हिस्से से शुरू होकर नितंब, जांघ के पीछे, घुटने के नीचे और कभी-कभी पैर की उंगलियों तक जाता है। खांसने, छींकने, झुकने या लंबे समय तक बैठने पर यह दर्द बढ़ जाता है।

कुछ लोगों को इसमें झुनझुनी या सुई की चुभन जैसा एहसास होता है। कुछ को सुन्नपन भी महसूस होता है। अगर दर्द हल्का हो तो चलने-फिरने में दिक्कत नहीं होती, लेकिन तेज दर्द में पैर उठाना भी मुश्किल हो जाता है। यह दर्द आमतौर पर शरीर के एक तरफ होता है।

सवाल- सायटिका की समस्या क्यों होती है? हमारी लाइफस्टाइल और इमोशंस से इसका क्या कनेक्शन है?

जवाब- सायटिका की मुख्य वजह सायटिक नर्व पर पड़ रहा अतिरिक्त दबाव है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे-

  • हर्नियेटेड डिस्क (स्लिप डिस्क)- जब रीढ़ की डिस्क अपनी जगह से फिसल जाती है और इससे नर्व दब जाती है।
  • डिजेनरेटिव डिस्क डिजीज- उम्र के साथ डिस्क घिसने से नर्व पर दबाव बढ़ता है।
  • स्पाइनल स्टेनोसिस- स्पाइनल कैनाल (एक पाइप जैसे आकार की हड्डी, जिसमें स्पाइनल कॉर्ड और नर्व्स होती हैं) सिकुड़ जाने से सायटिक नर्व पर दबाव बढ़ता है।
  • ऑस्टियोआर्थराइटिस- हड्डियों पर पड़ रहा अतिरिक्त दबाव सायटिक नर्व को दबाता है।

कुछ मामलों में चोट, प्रेग्नेंसी या ट्यूमर भी इसकी वजह हो सकते हैं।

अनहेल्दी लाइफस्टाइल भी कारण

लंबे समय तक बैठकर काम करने, भारी सामान उठाने और गलत पोश्चर के कारण इसका रिस्क बढ़ता है। मोटापा और कम फिजिकल एक्टिविटी से भी नर्व पर दबाव बढ़ता है। इसके अलावा स्मोकिंग के कारण भी सायटिका का रिस्क बढ़ता है।

इमोशन भी है वजह

लंबे समय तक तनाव रहने से हॉर्मोनल असंतुलन होता है। इसके कारण मसल्स टाइट हो जाती हैं और स्पाइन पर लोड बढ़ता है। तनाव से नींद खराब होती है, जो ओवरऑल शरीर को हेल्दी रखने के लिए बहुत क्रिटिकल है। इन सारी चीजों का असर सायटिक नर्व पर पड़ता है। कुल मिलाकर स्ट्रेस भी सायटिका का एक बड़ा कारण है।

सवाल- किस उम्र में और किन लोगों को सायटिका का खतरा ज्यादा होता है?

जवाब- सायटिका किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन यह ज्यादातर 30 से 50 साल की उम्र में होता है। इस उम्र तक आते–आते पूरे शरीर के साथ–साथ रीढ़ का भी क्षरण शुरू होता है। डिस्क धीरे–धीरे कमजोर पड़ रही होती है। ऐसे में अगर हमारी आदतें, लाइफस्टाइल खराब है तो रिस्क बढ़ जाता है।

सायटिका का खतरा उन लोगों को ज्यादा होता है, जो-

  • लंबे समय तक डेस्क जॉब करते हैं।
  • जो लोग बहुत लंबी ड्राइविंग करते हैं।
  • जिन्हें मोटापा है या वेट बढ़ गया है।
  • जो लोग भारी सामान उठाते हैं।
  • जो स्मोकिंग करते हैं।
  • जो डायबिटिक हैं।
  • जिनकी कोर स्ट्रेंथ कमजोर है।

इसके सभी रिस्क फैक्टर ग्राफिक में देखिए-

सवाल- जिन लोगों का लॉन्ग सिटिंग जॉब होता है, क्या उन्हें सायटिका का जोखिम ज्यादा होता है?

जवाब- बिल्कुल, लंबे समय तक कुर्सी पर झुककर बैठने से कमर की डिस्क पर दबाव पड़ता है और नर्व दब सकती है। गलत पोश्चर से स्पाइन की नेचुरल कर्व खराब होती है, जो स्लिप डिस्क का कारण बन सकती है।

ऑफिस वर्कर्स, आईटी प्रोफेशनल्स और ड्राइवर्स में यह बहुत कॉमन है। अगर हर घंटे ब्रेक न लें, स्ट्रेच न करें तो रिस्क कई गुना बढ़ जाता है।

सवाल- सायटिका के लक्षण क्या हैं? किन संकेतों पर तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए?

जवाब- सायटिका में आमतौर पर कमर से लेकर पैर तक तेज दर्द होता है। सभी मुख्य लक्षण ग्राफिक में देखिए-

सवाल- डॉक्टर सायटिका को कैसे डायग्नोज करते हैं? क्या हर केस में MRI जरूरी होता है?

जवाब- डॉक्टर पहले मेडिकल हिस्ट्री देखते हैं और कुछ फिजिकल एग्जाम करते हैं, जैसे-

स्ट्रेट लेग रेज टेस्ट- इसमें डॉक्टर पेशेंट का पैर सीधा उठाकर देखते हैं कि दर्द कब शुरू होता है। इसके बाद लोगों का चलने का तरीका भी चेक किया जाता है।

अगर टेस्ट में सायटिका की पुष्टि होती है तो एक्स-रे, CT स्कैन या MRI से इसका कारण पता किया जाता है।

हर केस में MRI टेस्ट की जरूरत नहीं होती है। यह सिर्फ गंभीर मामलों में किया जाता है।

सवाल- क्या सायटिका अपने आप ठीक हो सकता है या इलाज जरूरी होता है?

जवाब- ज्यादातर मामलों में सायटिका 4-6 हफ्ते में अपने आप ठीक हो जाता है। 80-90% लोग बिना किसी सर्जरी के ठीक हो जाते हैं। घर पर आइस-हीट थेरेपी, हल्की स्ट्रेचिंग और दर्द की दवा से काफी राहत मिलती है। आइस-हीट थेरेपी एक आसान घरेलू इलाज है। इसमें बारी-बारी से आइस बैग और हीट बैग से सिंकाई की जाती है।

अगर दर्द 6 हफ्ते से ज्यादा समय तक बना रहे तो इलाज जरूरी है। फिजियोथेरेपी और दवाई से जल्दी रिकवरी होती है।

सवाल- सायटिका होने पर क्या सावधानियां बरतना जरूरी है?

जवाब- सायटिका होने पर भारी वजन उठाने से बचें और लंबे समय तक एक ही जगह पर न बैठे रहें। बॉडी पोश्चर सही रखें। इस बात का ख्याल रखें कि जिस गद्दे पर लेटते हैं, वह बहुत सख्त या बहुत मुलायम न हो। डॉक्टर की सलाह से फिजियोथेरेपी और हल्की एक्सरसाइज करें। दर्द बढ़े तो तुरंत जांच कराएं।

सवाल- सायटिका में सर्जरी कब आखिरी विकल्प होती है और क्या इससे पूरी तरह राहत मिल जाती है?

जवाब- सायटिका के इलाज में सर्जरी हमेशा आखिरी विकल्प होती है। सर्जरी तब की जाती है, जब–

  • 6-8 हफ्ते कंजर्वेटिव ट्रीटमेंट से आराम न मिले।
  • कंजर्वेटिव ट्रीटमेंट का मतलब है ऐसा इलाज, जिसमें कोई बड़ा मेडिकल प्रोसीजर न हो।
  • बहुत कमजोरी हो या यूरिन पर कंट्रोल खत्म हो जाए।
  • नर्व डैमेज का खतरा हो।

सायटिका की सर्जरी में नर्व पर पड़ रहा दबाव हटाया जाता है। ज्यादातर मामलों में इससे पूरी तरह राहत मिल जाती है। हालांकि, रिस्क के कारण सर्जरी हमेशा अंतिम विकल्प ही होती है।

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