Sunday, 1 March 2026
ADVERTISEMENT SPACE (728x90)
Breaking News
Welcome to HindiNewsPro - The premium destination for live news updates. | India launches new satellite. | Gold prices drop slightly today.
Share
Blog

Husband Vs Wife Love Marriage Betrayal; Adjustment Disorder


  • Hindi News
  • Lifestyle
  • Husband Vs Wife Love Marriage Betrayal; Adjustment Disorder | Stress Depression

36 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

सवाल- मेरी उम्र 36 साल है। मैं एक सक्सेसफुल प्रोफेशनल हूं। लेकिन पिछले दो सालों से मेरी जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। मेरी पत्नी ने मुझे छोड़कर मेरे बेस्ट फ्रेंड से शादी कर ली। वो कॉलेज में प्रोफेसर है। हम छह साल से शादीशुदा थे। दोस्त हमेशा घर आता और मेरे एबसेंस में भी यहां रहता था। मुझे कभी शक नहीं हुआ।

लेकिन एक साल पहले मेरी पत्नी ने अपने अफेयर के बारे में बताया और तलाक मांग लिया। अपनी सफाई में उसने कहा कि वो मेरे साथ खुश नहीं थी। दिल के किसी कोने में मैं जानता हूं कि ये सच है, लेकिन स्वीकार नहीं कर पा रहा। ये धोखा मैं सह नहीं पा रहा हूं। हमने दुनिया के सामने कोई तमाशा नहीं किया, लेकिन एक साल से मेरी मेंटल-फिजिकल हेल्थ ठीक नहीं है। मैं कई-कई रात सो नहीं पाता। आधी रात तक शराब पीता हूं। मैं क्या करूं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। आपकी पत्नी ने आपको तलाक देकर आपके बेस्ट फ्रेंड से शादी कर ली। इसके बाद से आप उदासी, अवसाद, अकेलापन महसूस कर रहे हैं। सोने में समस्या हो रही है और शराब भी काफी बढ़ गई है। हर वक्त आपके दिमाग में वही घटना घूमती रहती है। इस वक्त आप एक भावनात्मक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं।

डिप्रेशन या एडजस्टमेंट डिसऑर्डर

आपने अपनी कंडीशन के बारे में जो लिखा है, उससे समझ में आता है कि ये डिप्रेशन नहीं, बल्कि एक एडजस्टमेंट डिसऑर्डर है। जीवन में एक बड़ा बदलाव हुआ है, जिसे स्वीकार करने और उसके साथ तालमेल बिठाने में दिक्कत पेश आ रही है।

जीवन में बड़ी भावनात्मक उथल-पुथल होने पर ऐसा होना स्वाभाविक है। इस वक्त हम जो उदासी और अकेलापन महसूस करते हैं, उसे अक्सर डिप्रेशन समझ लेते हैं। लेकिन साइंटिफिक टर्म में देखें तो डिप्रेशन के क्लिनिकल केस बिल्कुल अलग होते हैं। आगे मैं डिटेल में समझाने की कोशिश करूंग कि क्लिनिकल डिप्रेशन और एडजस्टमेंट डिसऑर्डर में क्या फर्क है।

डिप्रेशन और एडजस्टमेंट डिसऑर्डर में अंतर

डिप्रेशन क्या है, इसे नीचे दिए कुछ पॉइंटर्स से समझिए-

  • डिप्रेशन किसी घटना विशेष से नहीं जुड़ा होता।
  • डिप्रेशन में हर मामले में और हर वक्त नेगेटिविटी महसूस होती है।
  • सेल्फ वर्थ पूरी तरह खत्म हो जाती है।
  • क्लिनिकल डिप्रेशन हमारे ब्रेन के रिवॉर्ड न्यूरोट्रांसमीटर्स की फंक्शनिंग से जुड़ा होता है।
  • डिप्रेशन के कुछ केस CBT (कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी) की मदद से ठीक हो सकते हैं।
  • कुछ केसेज में दवाओं के सपोर्ट की जरूरत पड़ सकती है।

इसके ठीक उलट जीवन में कोई बड़ी दुर्घटना या बड़ा नकारात्मक बदलाव होने पर भी व्यक्ति उदासी और निराशा महसूस करता है। ये भाव भी डिप्रेशन जैसा ही लगता है, लेकिन असल में ये एडजस्टमेंट डिसऑर्डर होता है। एडजस्टमेंट डिसऑर्डर को नीचे दिए कुछ पॉइंटर्स से समझिए-

  • एडजस्टमेंट डिसऑर्डर किसी एक बुरे अनुभव या घटना से शुरू होता है।
  • महसूस हो रही उदासी और निराशा उसी खास घटना से जुड़ी होती है।
  • अगर उस घटना से ध्यान हटे या माहौल बदले तो कुछ देर के लिए बेहतर भी महसूस हो सकता है।

आपके केस में-

  • भावनात्मक दुख आपकी शादी टूटने और विश्वासघात के बाद शुरू हुआ।
  • इसके पहले आप मेंटली साउंड और इमोशनली सामान्य थे।
  • आज जब अवसाद महसूस करते हैं तो आपके मन में आ रहे ख्याल बार-बार उन्हीं दो लोगों और उसी घटना पर लौटते हैं।
  • आप निराशा महसूस कर रहे हैं, लेकिन आपका सेल्फ-वर्थ पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
  • इसलिए यह स्टैंडर्ड डिप्रेशन नहीं, बल्कि शादी-रिश्ते के टूटने से पैदा हुआ दुख और एडजस्टमेंट रिस्पांस है।

क्या ये एडजस्टमेंट डिसऑर्डर है?

करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 5 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल का आपका जवाब अगर ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग रोज’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें।

नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। अगर शुरुआती चार सवालों का आपका स्कोर हाई है तो यह डिप्रेशन नहीं है। यहां एडजस्टमेंट डिसऑर्डर की ही संभावना है। ऐसे में कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) मददगार हो सकती है।

दुख (ग्रीफ) के चरण (कुबलर–रॉस मॉडल)

कुबलर-रॉस मॉडल एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है। यह किसी शोक या गहरे नुकसान से जुड़ी भावनाओं को समझने का एक मॉडल है। 1969 में एलिजाबेथ कुबलर-रॉस ने यह मॉडल विकसित किया था। यह इंसान के भीतर होने वाले उन बदलावों को समझने में मदद करता है, जो किसी दुखद घटना के बाद उसके भीतर घटते हैं। यह मॉडल बताता है कि दुख को स्वीकारने और उससे ऊपर उठने की पूरी प्रक्रिया एकरेखीय नहीं होती है। नीचे दिए ग्राफिक से इसके पांच चरणों को समझिए।

ग्रीफ का सेल्फ एसेसमेंट

नीचे मैं पांच सवाल दे रहा हूं। जैसे आपने ऊपर सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट किया था, उसी तरह यहां आपको ग्रीफ का सेल्फ एसेसमेंट करना है और 0 से लेकर 3 तक के स्केल पर सवालों को रेट करना है। अगर आपका जवाब ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग रोज’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। अगर आपका स्कोर हाई है तो इसका मतलब है कि ये एडजस्टमेंट डिसऑर्डर है।

टेस्ट के सवाल

  1. मैं अब भी बार-बार उसी घटना को दिमाग में दोहराता हूं।
  2. मुझे उन दोनों पर बहुत ज्यादा गुस्सा आता है।
  3. मैं यही कल्पना करता रहता हूं कि कैसे पीछे लौटकर जो हुआ, उसे बदल दूं।
  4. मुझे लगता है कि इस रिश्ते के बिना जीवन अधूरा है।
  5. मैं इस सच्चाई को धीरे-धीरे स्वीकार कर पा रहा हूं।

कॉग्निटिव रीस्ट्रक्चरिंग

एक दुखद घटना का सकारात्मक अर्थ

हम जो महसूस करते हैं, उसका कारण उस घटना से ज्यादा उसका हमारा इंटरप्रिटेशन होता है। यानी हम उस घटना को कैसे देखते हैं, कैसे अपने मन में उसकी व्याख्या करते हैं। CBT थेरेपी इस काम में मददगार हो सकती है। वह घटनाओं को नहीं, बल्कि उसके अर्थ और व्याख्या को नए ढंग से इंटरप्रिटेट करने में हमारी मदद करती है। नीचे कुछ उदाहरणों से समझिए-

मन में आ रहा विचार- “मैंने अपने दो सबसे करीबी लोगों को खो दिया। मेरी जिंदगी बर्बाद हो गई।”

CBT आधारित संतुलित विचार- “यह घटना बेहद तकलीफदेह है। लेकिन इसने मुझे यह भी दिखा दिया कि जो लोग सबसे करीब दिखते थे, वे वास्तव में कैसे थे। अब मैं भ्रम में नहीं हूं।”

यह इंटरप्रिटेशन घटना को अच्छा नहीं बता रहा है। यह मानता है कि देर से सही, लेकिन सच्चाई सामने आई।

इसका फायदा- इस घटना से आंखों पर पड़ा पर्दा हट गया। आत्मसम्मान की नई सीमाएं तय हुईं। अब भविष्य में गलत लोगों पर इन्वेस्टमेंट नहीं होगा।

सोच बदलने का CBT फॉर्मेट

स्टेप 1: विचारों को नाम देना

“मैं पुरानी यादों के लूप में घूम रहा हूं। ये समस्या का समाधान नहीं है।”

Step 2: रिएलिटी चेक

“इन विचारों से न तो रिश्ता बदलेगा, न ही मुझे क्लोजर मिलेगा।”

Step 3: अपनी बाउंड्री तय करना

“मैं इस रिश्ते पर अब तय समय से ज्यादा नहीं सोचूंगा।”

Step 4: ध्यान बांटना

रोज 20 मिनट का ‘ग्रीफ विंडो’ तय करें। बाकी समय दिमाग को उस घटना के बारे में सोचने की अनुमति न दें।

बाकी समय उसका ख्याल आते ही कुछ और एक्टिविटी करें। जैसे वॉक करना, कोल्ड वाटर बाथ लेना, किसी दोस्त को फोन करना, गहरी सांसें लेना।

धोखे से पैदा हुआ ट्रस्ट इश्यू

भरोसा कैसे करें

यह धोखे से उपजे ट्रॉमा की सहज प्रतिक्रिया है। किसी अपने से धोखा मिलने पर ट्रस्ट इश्यू हो सकते हैं। ऐसे में अपने विचारों को फिर से फ्रेम करने और समझने की जरूरत है। कुछ उदाहरणों से समझें-

पुराना विचार- “दोस्त ने मेरे साथ ऐसा किया। अब लगता है कि कोई भी भरोसेमंद नहीं है।”

नया विचार- “कुछ लोगों ने भरोसा तोड़ा है। इसका मतलब ये नहीं कि सब ऐसे ही हैं।”

जीवन के नए प्रैक्टिकल नियम

  • तुरंत किसी को ‘बेस्ट फ्रेंड’ का टैग नहीं देना है।
  • भरोसा धीरे-धीरे व्यवहार से पैदा होता है।
  • प्राइवेसी और बाउंड्री शुरुआती महीनों में ही बनानी जरूरी है।
  • सावधानी बरतना और हर चीज को शक की नजर से देखना, दोनों अलग चीजें हैं।
  • सावधानी बरतना हेल्दी हैबिट है, हर किसी पर शक करना हेल्दी नहीं है।

चार हफ्ते का रिकवरी प्लान

सप्ताह 1

स्थिरीकरण

  • रोज कितनी शराब पी, इसका ट्रैक रखना।
  • तय समय पर सोना-जागना।
  • अपने ग्रीफ के लिए एक खास समय तय करना।
  • रोज 20–30 मिनट वॉक करना।

सप्ताह 2

विचारों पर नियंत्रण

  • अपने ट्रिगर्स को पहचानना।
  • शराब की इच्छा को 10 मिनट तक टालना।

सप्ताह 3

अपनी पहचान बदलना

मन में उठने वाला सवाल- “इस शादी के बिना मैं कौन हूं?”

नया अर्थ- मेरा काम, मेरे दोस्त, मेरा सोशल सर्कल, ये सब मैं हूं। शादी के अलावा जीवन की हरेक चीज को फिर से डिफाइन करना।

सप्ताह 4

स्वीकारना, आगे बढ़ना

खुद से पूछें- इस घटना से मैंने क्या सीखा?

जवाब– मैंने ये चीजें सीखीं।

  1. भविष्य के रिश्तों में हेल्दी बाउंड्री बनाना सीखा।
  2. आत्मसम्मान को फिर से डिफाइन करना सीखा।

प्रोफेशनल मदद कब जरूरी

अगर नीचे ग्राफिक में दी सिचुएशंस में से कोई भी स्थिति पैदा हो या संकेत दिखें तो प्रोफेशनल हेल्प जरूर लें।

अंतिम बात

अगर आप इस घटना को सही तरीके से प्रोसेस कर पाएं तो यह आपको कमजोर नहीं, बल्कि ज्यादा यथार्थवादी और स्पष्ट बना सकती है। आपने दो लोगों को नहीं खोया है। आपने एक भ्रम खोया है। यह अनुभव समय के साथ आपके जीवन को ज्यादा सुरक्षित और ईमानदार बनाएगा।

……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ– पति को बायपोलर डिसऑर्डर है: 12 साल से सेवा कर रही हूं, हर वक्त थकान सी रहती है, मैं डिप्रेस हो रही हूं, क्या करूं

किसी तरह की शारीरिक या मानसिक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति की देखभाल करने वाला खुद भी गहरे तनाव से गुजरता है। उसके ऊपर बीमार की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी होती है। आगे पढ़िए…

खबरें और भी हैं…



Source link

Newswahni

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *