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Brown Sugar Vs White Sugar Difference Explained; Nutritional Value


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21 घंटे पहले

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एक सर्वे के मुताबिक, भारत की 80% से ज्यादा आबादी रोज सुबह चाय पीती है। यानी हमारे दिन की शुरुआत अक्सर एक चम्मच चीनी के साथ होती है, लेकिन कहानी सिर्फ चाय तक सीमित नहीं है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में चीनी इतनी घुल-मिल गई है कि इसका एहसास ही नहीं होता है। बिस्किट और मिठाई से लेकर पैकेट बंद खाने-पीने की चीजों तक, हर जगह शुगर मिल ही जाती है।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया से लेकर बड़े-बड़े डॉक्टरों, किताबों और हेल्थ वेबसाइट्स तक, हर जगह चीनी के नुकसान पर खुलकर चर्चा होने लगी है। इसके कारण लोग व्हाइट शुगर से दूरी बनाने लगे हैं।

लेकिन हैरानी की बात ये है कि बहुत से लोग इसकी जगह ब्राउन शुगर को हेल्दी मानकर अपनी डाइट में शामिल करते हैं। जबकि ये सिर्फ मिथ है। रंग और स्वाद के फर्क के बावजूद ब्राउन और व्हाइट शुगर के न्यूट्रिशन और सेहत पर असर एक जैसे ही हैं। इसे लेकर कई गलतफहमियां फैली हुई हैं। ऐसे में सही जानकारी बेहद जरूरी है।

तो चलिए, आज जरूरत की खबर में हम व्हाइट और ब्राउन शुगर के बारे में विस्तार से बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि-

  • क्या वाकई ब्राउन शुगर, व्हाइट शुगर से बेहतर होती है?
  • व्हाइट और ब्राउन शुगर का ब्लड शुगर पर क्या प्रभाव होता है?

एक्सपर्ट: डॉ. पूनम तिवारी, सीनियर डाइटीशियन, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ

सवाल- व्हाइट और ब्राउन शुगर में क्या अंतर है?

जवाब- व्हाइट और ब्राउन शुगर मूल रूप से एक ही सोर्स (गन्ना) से बनती हैं। दोनों के बीच असली अंतर उनकी प्रोसेसिंग और मोलासेस (गुड़ जैसा गाढ़ा शीरा) की मात्रा का होता है।

व्हाइट शुगर को पूरी तरह रिफाइन किया जाता है, जिसमें से मोलासेस निकाल दिया जाता है। इसी कारण इसका रंग सफेद और दाने सूखे होते हैं। मोलासेस निकालने के कारण इसमें एक खास तरह की सौंधी सुगंध भी नहीं होती है, जो कि ब्राउन शुगर में होती है। व्हाइट चीनी चाय, कॉफी और ज्यादातर रेसिपीज में आसानी से घुल जाती है।

वहीं जब रिफाइंड व्हाइट शुगर में दोबारा मोलासेस मिलाकर चीनी बनाई जाती है तो वह ब्राउन शुगर हो जाती है। मोलासेस की मात्रा 3% से लेकर 10% तक हो सकती है। यह ब्राउन शुगर की क्वालिटी और उसकी थिकनेस पर निर्भर करता है।

लाइट ब्राउन शुगर में मोलासेस कम होता है, जबकि डार्क ब्राउन शुगर में इसकी मात्रा ज्यादा होती है। इसी कारण ब्राउन शुगर नम, मुलायम होती है। इसमें हल्का कैरामेल (भुनी हुई मिठास) जैसा स्वाद आता है।

कुल मिलाकर कहने का आशय ये है कि सफेद चीनी और ब्राउन चीनी में फर्क सिर्फ स्वाद, नमी और रंग का है। दोनों के न्यूट्रिशन में कोई खास अंतर नहीं है। सेहत पर दोनों का प्रभाव भी बिल्कुल एक जैसा है। नीचे दिए ग्राफिक से व्हाइट और ब्राउन शुगर की न्यूट्रिशनल वैल्यू समझिए-

सवाल- लोग व्हाइट शुगर की जगह ब्राउन शुगर खाना क्यों पसंद करते हैं?

जवाब- अब लोग हेल्थ को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं। अब सोशल मीडिया, फिटनेस एक्सपर्ट्स और ऑनलाइन आर्टिकल्स, सब चीनी के खतरों से आगाह कर रहे हैं। सब एक ही बात कह रहे हैं कि व्हाइट शुगर रिफाइंड है, यह सेहत के लिए नुकसानदायक है। सोशल मीडिया से ही लोगों को यह भी पता चलता है कि ब्राउन शुगर उसका हेल्दी विकल्प है।

ब्राउन शुगर का रंग गहरा होने और उसमें मोलासेस मौजूद होने के कारण लोगों को लगता है कि इसमें मिनरल्स होते हैं और यह नेचुरल है। हालांकि कोई इतनी जहमत नहीं उठाता कि डॉक्टर से पूछे, कोई साइंस स्टडी पढ़े। लोग बस मान लेते हैं कि ब्राउन शुगर बेहतर है। वो फैक्ट चेक नहीं करते हैं।

इसके अलावा इसका हल्का कैरामेल जैसा स्वाद चाय-कॉफी और मिठाइयों को अलग स्वाद देता है, जिससे लोग इसे बेहतर समझने लगते हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि ब्राउन शुगर खाने से ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता, जबकि साइंटिफिक रूप से यह बात एकदम गलत है।

सवाल- क्या ब्राउन शुगर व्हाइट शुगर से बेहतर होती है?

जवाब- ब्राउन शुगर को अक्सर लोग व्हाइट शुगर का हेल्दी विकल्प मान लेते हैं, लेकिन यह सच नहीं है। इसे नीचे दिए पाॅइंट्स से समझिए-

  • अगर आपको डायबिटीज है, मोटापा है या मेटाबॉलिज्म स्लो है तो व्हाइट शुगर की जगह ब्राउन शुगर खाने से कोई फायदा नहीं होगा।
  • अगर आपकी लाइफस्टाइल सिडेंटरी है यानी आप घंटों एक ही जगह पर बैठकर काम करते हैं तो आपके लिए ब्राउन शुगर भी उतनी ही नुकसानदायक है, जितनी कि व्हाइट शुगर।
  • ब्राउन और व्हाइट शुगर दोनों में कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा लगभग बराबर होती है।
  • दोनों ही शरीर में जाकर ब्लड शुगर लेवल को तेजी से बढ़ाती हैं।
  • दोनों को खाने से समान मात्रा में इंसुलिन रिलीज होता है, जो कि एक फैट डिपॉजिट हॉर्मोन है।
  • अगर चीनी से बढ़ा ब्लड शुगर और उससे मिली एनर्जी खर्च न हो तो वह फैट के रूप में शरीर में जमा हो जाती है। यानी सफेद चीनी खाओ या ब्राउन चीनी, वजन तो बढ़ेगा ही।

सवाल- व्हाइट और ब्राउन शुगर का ब्लड शुगर पर क्या प्रभाव होता है?

जवाब- व्हाइट और ब्राउन शुगर, दोनों ही शरीर में जाकर ग्लूकोज और फ्रुक्टोज में बदलती हैं। इसके कारण ब्लड शुगर लेवल पर दोनों का प्रभाव लगभग समान होता है। दोनों में से कुछ भी खाएं, इंसुलिन रिलीज होगा ही। अगर बहुत ज्यादा मात्रा में खाएं तो इंसुलिन रेजिस्टेंस भी पैदा होगा ही। इसलिए अगर आप डायबिटिक या प्री-डायबिटिक हैं तो ब्राउन शुगर को चीनी का हेल्दी विकल्प न मानें। आपके लिए ब्राउन शुगर भी उतनी ही खतरनाक है।

सवाल- एडेड शुगर का सेवन कम क्यों करना चाहिए?

जवाब- एडेड शुगर ऐसी चीनी होती है, जो खाने-पीने की चीजों में ऊपर से मिलाई जाती है और यह शरीर को सिर्फ कैलोरी देती है, पोषण नहीं। इसका ज्यादा सेवन ब्लड शुगर को बार-बार बढ़ाता है, जिससे इंसुलिन पर दबाव पड़ता है।

लंबे समय तक एडेड शुगर लेने से डायबिटीज, मोटापा, हार्ट डिजीज और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा यह दांतों की सड़न और फैटी लिवर जैसी समस्याओं से भी जुड़ी है। इसलिए सेहत को संतुलित रखने के लिए एडेड शुगर से बचना चाहिए।

सवाल- व्हाइट और ब्राउन शुगर के क्या विकल्प हो सकते हैं?

जवाब- अगर आप डाइट में शुगर की मात्रा कम करना चाहते हैं तो व्हाइट और ब्राउन शुगर की जगह कुछ बेहतर विकल्प अपनाए जा सकते हैं। हालांकि इनका भी सीमित सेवन करना चाहिए।

सवाल- क्या डायबिटिक लोग ब्राउन शुगर का इस्तेमाल कर सकते हैं?

जवाब- ब्राउन और व्हाइट शुगर दोनों ही ब्लड शुगर लेवल को लगभग समान रूप से बढ़ाती हैं। इसलिए डायबिटिक लोगों के लिए ब्राउन शुगर सुरक्षित विकल्प नहीं है।

सवाल- चाय-कॉफी में व्हाइट की जगह ब्राउन शुगर लेना सही है या नहीं?

जवाब- चाय-कॉफी में व्हाइट शुगर की जगह ब्राउन शुगर लेना सेहत के लिहाज से कोई बड़ा फर्क नहीं डालता है। सिर्फ स्वाद बदलता है, इसका कोई हेल्थ बेनिफिट नहीं है। अगर मकसद सेहत सुधारना है तो शुगर का प्रकार बदलने से ज्यादा जरूरी उसकी मात्रा कम करना है।

सवाल- एक दिन में कितना शुगर खाना सुरक्षित माना जाता है?

जवाब- सीनियर डाइटीशियन डॉ. पूनम तिवारी बताती हैं कि अगर कोई व्यक्ति रोज करीब 2000 कैलोरी लेता है तो उसे दिन में 1–2 चम्मच से ज्यादा एडेड शुगर नहीं लेनी चाहिए।

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