Sunday, 1 March 2026
ADVERTISEMENT SPACE (728x90)
Breaking News
Welcome to HindiNewsPro - The premium destination for live news updates. | India launches new satellite. | Gold prices drop slightly today.
Share
Blog

Happy Patel Khatarnak Jasoos Review: जासूसी के चक्कर में कॉमेडी का हो गया मर्डर


बॉलीवुड के ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ आमिर खान जब किसी प्रोजेक्ट से जुड़ते हैं, तो दर्शकों की उम्मीदें सातवें आसमान पर होना लाजिमी है. 2011 में आमिर खान प्रोडक्शन में बनी ‘डेली बेली’ ने जिस तरह से कॉमेडी और डार्क ह्यूमर का एक नया बेंचमार्क सेट किया था, आमिर खान प्रोडक्शंस की नई फिल्म ‘हैप्पी पटेल: खतरनाक जासूस’ से भी कुछ वैसी ही उम्मीदें थीं, लेकिन क्या यह फिल्म उन उम्मीदों पर खरी उतरी? या यह सिर्फ एक बिखरा हुआ जासूसी का जाल बनकर रह गई? आइए जानते हैं विस्तार से.

फिल्म की कहानी की बात करें तो यह स्पाई-कॉमेडी हमें मिलाती है ‘हैप्पी पटेल’ (वीर दास) से. हैप्पी कोई आम जासूस नहीं है; वह ब्रिटिश लहजे में हिंदी बोलने वाला एक ऐसा अनाड़ी जासूस है, जिसकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं. कहानी तब रफ्तार पकड़ती है जब हैप्पी को एक बेहद गोपनीय और पेचीदा मिशन पर गोवा भेजा जाता है. मिशन है एक वैज्ञानिक को खूंखार क्रिमिनल गैंग के चंगुल से छुड़ाना. लेकिन, यहां ‘जेम्स बॉन्ड’ जैसी गंभीरता की उम्मीद न करें. हैप्पी का मिशन तकनीकी कौशल से कम और सांस्कृतिक गलतफहमियों व बेवकूफी भरी गलतियों से ज्यादा भरा हुआ है.

फिल्म की पटकथा उसे गोवा के उन गलियारों में ले जाती है, जहां एक तरफ गैंगस्टर्स का राज है, तो दूसरी तरफ मस्ती और बेफिक्री का माहौल. मिशन के दौरान हैप्पी की मुलाकात रूपा (मिथिला पालकर) से होती है. पहली नजर का प्यार और जासूसी का रोमांच साथ-साथ चलता है, लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब पता चलता है कि रूपा का सीधा कनेक्शन गोवा की खूंखार लेडी गैंगस्टर ‘मामा’ (मोना सिंह) से है. रूपा की असली पहचान फिल्म के मध्य भाग में एक बड़ा धमाका करती है.

हैप्पी इस लड़ाई में अकेला नहीं है. उसे साथ मिलता है गीत (शारिब हाशमी) और रॉक्सी (सृष्टि तावड़े) का. ये दोनों किरदार फिल्म की रीढ़ की हड्डी की तरह काम करते हैं और हैप्पी के अटपटे मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में उसकी मदद करते हैं. फिल्म के अंत तक आते-आते हैप्पी को एहसास होता है कि उसके दो अंग्रेज पिताओं की परवरिश से कहीं ज्यादा सुकून उसे भारत की मिट्टी और यहां के लोगों में मिल रहा है.

इस फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसके कलाकार हैं, हालांकि स्क्रिप्ट ने सबका साथ नहीं दिया. इसमें कोई दो राय नहीं कि वीर दास एक मंझे हुए कलाकार हैं. उन्होंने ‘हैप्पी पटेल’ के किरदार में चार्म, ह्यूमर और हीरोइज्म का जो मिश्रण पेश किया है, वह काबिले तारीफ है. उनका ब्रिटिश एक्सेंट और हिंदी शब्दों का जानबूझकर किया गया ‘अनर्थ’ शुरुआत में गुदगुदाया है. शारिब हाशमी ने एक बार फिर साबित किया कि वह किसी भी सीन में जान फूंक सकते हैं. वहीं, सृष्टि तावड़े ने अपनी संक्रामक एनर्जी और कॉन्फिडेंस से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी. मिथिला पालकर अपने किरदार में सहज और रिफ्रेशिंग दिखीं. प्रतिभाशाली होने के बावजूद, मोना सिंह का किरदार उतना प्रभावशाली नहीं बन सका जितनी एक ‘विलेन’ से उम्मीद की जाती है.

वहीं, फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज आमिर खान की एंट्री रही. उनके कैमियो ने न केवल कहानी की दिशा बदली, बल्कि स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी ने फिल्म के गिरते स्तर को कुछ देर के लिए संभाल लिया. ‘जाने तू या जाने ना’ फेम इमरान खान ने इस फिल्म के जरिए एक ‘धांसू’ वापसी की है. उनकी मैच्योरिटी और शांत अभिनय ने स्क्रीन पर चल रही अफरा-तफरी के बीच एक संतुलन बनाए रखा. उनके फैंस के लिए उन्हें दोबारा पर्दे पर देखना एक विजुअल ट्रीट है.

कवि शास्त्री और वीर दास ने निर्देशन की कमान संभाली है. कुछ दृश्यों में उनका विजन ‘मैजिकल’ और ‘कंट्रोल्ड’ नजर आता है, लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स हैं. पहले फ्रेम से आखिरी फ्रेम तक फिल्म दर्शकों को बांधने में संघर्ष करती दिखती है. फिल्म का एक्शन और कॉमेडी जो इसके मुख्य स्तंभ होने चाहिए थे, सबसे कमजोर कड़ी साबित हुए. कहानी में अचानक से प्यार का उमड़ना और बिना किसी ठोस वजह के एक्शन सीक्वेंस का शुरू हो जाना दर्शकों को खटकता है. अगर आप फिल्म में लॉजिक या तर्क ढूंढने की कोशिश करेंगे, तो आपको सिर्फ निराशा हाथ लगेगी.

फिल्म का दूसरा हाफ पहले के मुकाबले थोड़ा बेहतर है, जहां ट्विस्ट और टर्न्स थोड़े रोमांचक हो जाते हैं. फिल्म का अंत एक ‘कुकिंग बैटल’ से शुरू होकर ‘डांसिंग फाइट’ पर खत्म होता है, जो सुनने में तो फनी लगता है लेकिन पर्दे पर इसका असर मिला-जुला रहता है. एक महत्वपूर्ण बात यह है कि फिल्म में गालियों और अभद्र भाषा का काफी इस्तेमाल किया गया है, जिसके कारण यह 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बिल्कुल नहीं है. वीर दास द्वारा हिंदी शब्दों का गलत उच्चारण कुछ जगह तो हंसाता है, लेकिन बार-बार होने पर यह अखरने लगता है.

‘हैप्पी पटेल: खतरनाक जासूस’ एक ऐसी सवारी है जो शुरू तो बड़े उत्साह के साथ होती है, लेकिन मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते थक जाती है. आमिर खान के प्रोडक्शन की छाप होने के बावजूद, फिल्म ‘देली बेली’ जैसा कल्ट स्टेटस हासिल करने से कोसों दूर रह गई. यह फिल्म उन लोगों के लिए है जो वीर दास के ह्यूमर के कट्टर प्रशंसक हैं या जो बिना दिमाग लगाए बस कुछ समय के लिए दोस्तों के साथ मस्ती करना चाहते हैं. मेरी ओर से फिल्म को 5 में 1.5 स्टार.



Source link

Newswahni

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *