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जेब में चंद पैसे लेकर निकल पड़े थे स्टार बनने, फुटपाथ पर गुजारी कई रातें, जावेद अख्तर का अनूठा सफर


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जावेद अख्तर, ग्वालियर में जन्मे, सलीम खान संग शोले जैसी फिल्में लिखीं, 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड, पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित, संघर्ष से सफलता तक पहुंचे कवि और विचारक हैं.

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जेब में चंद पैसे लेकर निकल पड़े थे स्टार बनने, फुटपाथ पर गुजारी कई रातेंजावेद अख्तर का शानदार जीवन.

नई दिल्ली: जावेद अख्तर का जीवन सफलता की एक ऐसी दास्तां है, जो किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं है. जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था. आज उनके बर्थडे पर जब हम उनके सफर पर नजर डालते हैं, तो उनकी शख्सियत के कई पहलू सामने आते हैं. उनके पिता जां निसार अख्तर और दादा दोनों मशहूर शायर थे, जिससे शायरी उनके खून में थी. अमीर दोस्तों की सुख-सुविधाएं देखकर उन्होंने बचपन में ही ठान लिया था कि वे एक सफल और अमीर इंसान बनेंगे.

27 पैसे की हकीकत
जावेद 1964 में जब मुंबई आए, तो उनकी जेब में मात्र 27 पैसे थे. उन्होंने कई रातें फुटपाथ पर और कमाल अमरोही के स्टूडियो में बिताईं. शुरुआत में उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में हीरो-हीरोइन के छोटे-मोटे काम (जैसे जूते या कोट लाना) भी किए, जिसे वे आज के ‘सम्मानजनक’ कल्चर से तुलना करते हुए याद करते हैं.

सलीम-जावेद की ऐतिहासिक जोड़ी
जावेद अख्तर ने सलीम खान के साथ मिलकर भारतीय सिनेमा को ‘एंग्री यंग मैन’ (अमिताभ बच्चन) की पहचान दी. उनकी कुछ कालजयी फिल्में हैं- शोले, जंजीर, दीवार, यादों की बारात, और मिस्टर इंडिया. उन्होंने पटकथा लेखन को फिल्म इंडस्ट्री में एक सम्मानजनक और स्वतंत्र दर्जा दिलाया. उन्हें 8 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड मिल चुका है. साहित्य और सिनेमा में योगदान के लिए पद्मश्री (1999) और पद्मभूषण (2007) से नवाजा गया.

जावेद अख्तर का कवि मन
जावेद अख्तर न केवल एक लेखक और गीतकार हैं, बल्कि एक प्रखर वक्ता और सामाजिक विचारक भी हैं. जावेद अख्तर का कहना, ‘कभी जो ख्वाब था वो पा लिया है, मगर जो खो गई वो चीज क्या थी’ उनके जीवन के उस दर्शन को दर्शाता है जहां सफलता तो मिली, लेकिन स्ट्रगल के दिनों की वो मासूमियत और यादें कहीं पीछे छूट गईं.

राजनीति में दखल
जावेद अख्तर धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आजादी पर खुलकर बोलते रहे हैं. जावेत अख्तर ने 2010 से 2016 तक राज्यसभा के नामित सदस्य के रूप में कला क्षेत्र को रीप्रेजेंट किया. उन्होंने 2019 के भारतीय आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) का सपोर्ट भी किया था. साहित्य, फिल्म और स्वतंत्र सोच में उनके योगदान के लिए उन्हें 2020 में रिचर्ड डॉकिंस अवॉर्ड पाने वाले पहले भारतीय बनने का गौरव मिला. 2024 में ‘एंग्री यंग मेन’ नाम की डॉक्यूमेंट्री सीरीज रिलीज हुई, जिसमें सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी पर फोकस किया गया है.

About the Author

Abhishek Nagar

अभिषेक नागर News 18 Digital में Senior Sub Editor के पद पर काम कर रहे हैं. वे News 18 Digital की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. वे बीते 6 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे News 18 Digital से पहल…और पढ़ें

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