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Child Vs Sports Interest; Parents Pressure Impact


16 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं लुधियाना से हूं। मेरा और मेरे हसबैंड का स्पोर्ट्स बैकग्राउंड है। मैं स्कूल के दिनों में वॉलीबॉल खेलती थी। मेरे पति स्टेट लेवल तक क्रिकेट खेल चुके हैं। इसलिए हमेशा से यह उम्मीद रही कि हमारे बच्चे भी खेलकूद और फिटनेस की तरफ स्वाभाविक रूप से इंटरेस्टेड होंगे।

लेकिन मेरे 9 साल के बेटे को स्पोर्ट्स में बिल्कुल रुचि नहीं है। मैंने उसे खेल के लिए मोटिवेट करने की काफी कोशिश की। स्कूल की स्पोर्ट्स टीम में शामिल होने के लिए कहा, स्पोर्ट्स एकेडमी में भी 1–2 बार एडमिशन कराया, लेकिन हर बार उसने जाने से मना कर दिया या कुछ दिन बाद छोड़ दिया। मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम क्या करें कि स्पोर्ट्स में उसकी रुचि बढ़े। कृपया मार्गदर्शन करें।

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- मैं आपका कंसर्न समझ सकती हूं। आप दोनों स्पोर्ट्स से जुड़े हैं, इसलिए बच्चे से फिटनेस की उम्मीद होना स्वाभाविक है, लेकिन यहां थोड़ा रुककर सोचने की जरूरत है।

जवाब देने से पहले मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूं। आपने स्कूल के दिनों में वॉलीबॉल खेला, क्योंकि उसमें आपका मन लगता था, आप उस खेल में अच्छी थीं और उससे आपको खुशी मिलती थी।

कल्पना कीजिए कि अगर आपके माता-पिता प्रोफेशनल पेंटर होते और वे आपसे कहते कि आपको भी पेंटिंग ही करनी है। इसके लिए वह आपको जबरदस्ती पेंटिंग क्लासेज भेजते, महंगे कलर्स और ब्रश दिलवाते तो क्या आप आज एक अच्छी पेंटर होतीं? इसी सवाल के जवाब में ही आपके सवाल का जवाब भी छिपा है।

शायद आपका जवाब ‘नहीं’ होगा। तो ये समझिए कि हर बच्चा अलग होता है। उसकी रुचियां अलग होती हैं, उसकी काबिलियत अलग होती है। सिर्फ इसलिए कि मां-बाप ने कोई काम किया है, तो बच्चे को भी वही करना चाहिए। यह सोचना बहुत गलत है। रुचियां कभी जेनेटिक नहीं होतीं कि जो हमें पसंद था, वही बच्चे को भी पसंद आए।

बच्चे की रुचियों को समझें

बतौर पेरेंट्स हमारी जिम्मेदारी है कि हम ये पहचानें कि बच्चा किस चीज में बेस्ट है, किसमें उसकी रुचि है और किसमें उसका मन लगता है। उसके इंटरेस्ट और स्किल्स को समझना, उसी दिशा में मोटिवेट करना और जरूरी सपोर्ट देना, यही सही पेरेंटिंग है।

बच्चा स्पोर्ट्स में रुचि क्यों नहीं ले रहा?

अक्सर पेरेंट्स इसके पीछे बच्चे के आलस को एक बड़ी वजह मानते हैं। जबकि उसके स्पोर्ट्स में रुचि न लेने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण भी हो सकते हैं। जैसे कि–

  • उसे हारने से डर लगता है।
  • खेल को लेकर सोशल जजमेंट का डर या एंग्जाइटी है।
  • बच्चा फिजिकली ज्यादा एक्टिव नहीं है। उसका एनर्जी लेवल कम है।
  • बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। वो जल्दी थक जाता है।
  • जो खेल खेला जा रहा है, वह बच्चे का पसंदीदा गेम नहीं है।
  • कोच का व्यवहार सख्त है या बच्चे को कोच से डर लगता है।
  • दूसरे बच्चों की परफॉर्मेंस से उसकी तुलना होती है, जिससे उसे डर लगता है।

बच्चे को फोर्स करने के खतरे

अगर बच्चे के मना करने के बावजूद उस पर दबाव बनाया जा रहा है या उसे जबरदस्ती स्पोर्ट्स के लिए भेजा जा रहा है तो इसके कुछ नेगेटिव परिणाम भी हो सकते हैं।

अगर आपका कंसर्न ये है कि बच्चा स्पोर्ट्स में इनवॉल्व होगा तो फिजिकली फिट रहेगा, तो इसके लिए कुछ आसान तरीके अपना सकती हैं।

फोर्स करने के बजाय अपनाएं ये तरीके

जब आप बच्चे को फोर्स करते हैं, तो उसका ‘कोर्टिसोल’ (स्ट्रेस हाॅर्मोन) लेवल बढ़ता है, जो सीखने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसलिए बीच का रास्ता चुनना चाहिए। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें।

स्पोर्ट्स नहीं, फिटनेस पर करें फोकस

यहां एक बात क्लीयर समझना होगा कि आपका उद्देश्य बच्चे को एथलीट बनाना या मेडल जिताना नहीं, बल्कि फिजिकली एक्टिव रखना होना चाहिए।

अगर वह क्रिकेट या फुटबॉल नहीं खेलना चाहता, तो हो सकता है कि उसे योग, डांस या सिर्फ पार्क में टहलना पसंद हो। ऐसे में फिटनेस के लिए उसे उसका पसंदीदा गेम खेलने दें। इसके कई सारे विकल्प हैं।

पेरेंट्स कभी न करें ये गलतियां

ये सच है कि खेलकूद से अनुशासन, टीम वर्क और फिजिकल फिटनेस आती है, लेकिन इसके लिए ‘फोर्स’ करना सही नहीं है। अगर आप उसे जबरदस्ती मैदान में भेजेंगी तो वह खेल से नफरत करने लगेगी और उसका आत्मविश्वास भी कम हो सकता है।

अक्सर माता-पिता अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उन पर अपनी उम्मीदें थोप देते हैं। इसे साइकोलॉजी में ‘प्रोजेक्शन’ कहते हैं, इसका मतलब है कि पेरेंट्स अपने सपनों को बच्चों के जरिए जीना चाहते हैं।

आपका खिलाड़ी होना आपके बेटे के लिए प्रेरणा तो है, लेकिन यह उस पर एक दबाव भी डाल सकता है। उसे शायद यह डर रहता हो कि मैदान पर उसकी तुलना हमेशा आपकी कामयाबी से की जाएगी। इसी तुलना की वजह से वह खेल से दूर भागने लगा है। उसके लिए अब खेल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक कठिन परीक्षा बन गया है।

अक्सर एथलीट पेरेंट्स के बच्चे यह दबाव महसूस करते हैं कि अगर वे खेल में अच्छे नहीं हुए तो वे अपने पेरेंट्स को निराश कर देंगे। कई बार स्पोर्ट्स बैकग्राउंड वाले पेरेंट्स जाने-अनजाने में कुछ गलतियां करते हैं।

खेल के प्रति नजरिया बदलें

बच्चे को जबरदस्ती किसी एकेडमी भेजने के बजाय, घर में ऐसा माहौल रखें, जहां खेल-कूद सिर्फ मौज-मस्ती के लिए हो, न कि जीत-हार के लिए। उसे यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसे कोई खास ट्रेनिंग दी जा रही है। उसे अपनी पसंद का काम करने की आजादी दें। आपकी सफलता उसके लिए सीख होनी चाहिए, न कि कोई ऐसा बोझ जिसे उठाना उसके लिए मुश्किल हो जाए।

अंत में यही कहूंगी कि आपका बेटा अभी सिर्फ 9 साल का है और उसके लिए उसकी छोटी सी दुनिया ही सबकुछ है। उसे यह अहसास दिलाएं कि आप उसकी पसंद की कद्र करती हैं। जब उसे घर से पूरा साथ और भरोसा मिलेगा, तो वह खुद नई चीजें सीखने की हिम्मत कर पाएगा। हो सकता है कि आज उसकी स्पोर्ट्स में दिलचस्पी न हो, लेकिन आपका साथ पाकर कल वह किसी और एक्टिविटी में अपनी प्रतिभा दिखाए।

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