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80 के दशक की शुरुआत में जब चॉकलेटी ब्वॉय ऋषि कपूर का करियर ढलान पर था, तब सुभाष घई की फिल्म ‘कर्ज’ उनके लिए उम्मीद की एक किरण बनकर आई. हालांकि, यह फिल्म फिरोज खान की ‘कुर्बानी’ की ब्लॉकबस्टर सफलता के सामने टिक नहीं पाई और बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई. इस विफलता ने ऋषि कपूर को मानसिक रूप से काफी परेशान कर दिया था, लेकिन वक्त बदला और ‘कर्ज’ अपने आइकॉनिक म्यूजिक और कहानी के दम पर एक ‘कल्ट क्लासिक’ बन गई और पुनर्जन्म की इस कहानी ने ऋषि कपूर को बॉलीवुड का सदाबहार धुरंधर बना दिया, जिसने बाद में सारे सुपरस्टार्स का सिंहासन हिला कर रख दिया था.
नई दिल्ली. बॉलीवुड के इतिहास में साल 1973 में ‘बॉबी’ के साथ एक ऐसा सितारा चमका था, जिसने रोमांस की परिभाषा बदल दी थी और वो थे ऋषि कपूर. अपनी मासूमियत और स्वेटर वाले लुक से उन्होंने लाखों दिलों पर राज किया, लेकिन 70 के दशक का अंत आते-आते बॉलीवुड का मिजाज बदलने लगा था. ‘एंग्री यंग मैन’ का दौर शुरू हो चुका था और दर्शक अब केवल बगीचों में दौड़ते प्रेमी को नहीं, बल्कि हाथ में बंदूक थामे और धूल में लिपटे नायक को देखना चाहते थे.
एक समय ऐसा आया जब ऋषि कपूर का करियर ढलान पर दिखने लगा. उनकी रोमांटिक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ रही थीं. तभी उनके हाथ लगी एक ऐसी फिल्म, जिसने उन्हें न केवल एक नया जीवन दिया, बल्कि आज वह फिल्म बॉलीवुड की सबसे बड़ी ‘कल्ट क्लासिक’ मानी जाती है और वह फिल्म थी ‘कर्ज’, जो साल 1980 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी.
70 के दशक में अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे ‘माचो मैन’ का दबदबा था. ऋषि कपूर की चॉकलेटी इमेज इस एक्शन की लहर में कहीं खोती जा रही थी. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो फिल्म समीक्षकों ने कहना शुरू कर दिया था कि ऋषि कपूर केवल ‘बॉबी’ की सफलता के सहारे टिके हैं. उनके करियर को एक ऐसे ‘धमाके’ की जरूरत थी, जो यह साबित कर सके कि वे सिर्फ रोमांस ही नहीं, बल्कि सस्पेंस और ड्रामा भी बखूबी निभा सकते हैं.
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सुभाष घई के निर्देशन में बनी ‘कर्ज’ एक रिवेंज-थ्रिलर थी, जो पुनर्जन्म पर आधारित थी. ऋषि कपूर ने इसमें ‘मोंटी’ का किरदार निभाया, जो एक पॉप स्टार है और उसे अपने पिछले जन्म की धुंधली यादें परेशान करती हैं. फिल्म में मोंटी का वह गिटार वाला स्वैग और ‘ओम शांति ओम’ जैसे गानों पर उनका डांस आज भी बेमिसाल माना जाता है, लेकिन इस फिल्म के साथ जुड़ी हकीकत बेहद चौंकाने वाली है.
आज भले ही हम ‘कर्ज’ को एक मास्टरपीस मानते हैं, लेकिन 1980 में जब यह रिलीज हुई तो बॉक्स ऑफिस पर यह बुरी तरह फ्लॉप रही थी. इसकी सबसे बड़ी वजह थी फिरोज खान की ‘कुर्बानी’. ‘कर्ज’ के साथ सिनेमाघरों में ‘कुर्बानी’ रिलीज हुई थी, जिसमें विनोद खन्ना और फिरोज खान का जबरदस्त एक्शन और ‘आप जैसा कोई’ जैसे गानों का जादू था. ‘कुर्बानी’ की ऐसी सुनामी आई कि ‘कर्ज’ उसके सामने टिक नहीं पाई. कहा तो ये भी जाता है कि उस समय के क्रिटिक्स ने भी फिल्म की कहानी को ‘अजीब’ बताकर इसकी आलोचना की थी.
खबरों की मानें फिल्म ‘कर्ज’ के फ्लॉप होने का असर ऋषि कपूर पर इतना गहरा हुआ कि वे गहरे सदमे में चले गए थे. उन्हें इस फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं. उन्होंने कई बार मीडिया से इस बारे में जिक्र किया था कि ‘कर्ज’ की असफलता के बाद वे सेट पर जाने से डरने लगे थे. उन्हें लगा कि शायद उनका दौर अब खत्म हो चुका है. ‘कुर्बानी’ के साथ सीधे मुकाबले ने उनके आत्मविश्वास को झकझोर कर रख दिया था.
यहां पर एक कहावत फिल्म ‘कर्ज’ के लिए सटीक बैठती है कि ‘सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है’ और वही ‘कर्ज’ के साथ भी हुआ. थिएटर्स से उतरने के बाद जब यह फिल्म टीवी और वीसीआर कैसेट के जरिए लोगों के घरों तक पहुंची तो दर्शकों को इसकी असली गहराई समझ आई. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत, विशेष रूप से ‘दर्द-ए-दिल’, ‘एक हसीना थी’ और ‘मैं सोलह बरस की’ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए.
फिल्म में सिमी ग्रेवाल का ‘विलेन’ अवतार और राजकिरण का वो दर्द भरा किरदार लोगों के जेहन में बस गया. धीरे-धीरे ‘कर्ज’ एक ऐसी फिल्म बन गई जिसे हर पीढ़ी ने सराहा. आज ऋषि कपूर की इस फिल्म को पुनर्जन्म की कहानियों के लिए ‘बेंचमार्क’ माना जाता है. आज भले ही ऋषि कपूर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्होंने ‘कर्ज’ सहित कई ऐसी फिल्में दी हैं, जिनके जरिए उनकी यागें हमेशा उनके फैंस के दिलों में जिंदा रहेंगी.
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