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जब हिंदी सिनेमा सुरक्षित विषयों तक सीमित था, तब बीआर चोपड़ा ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने पूरी इंडस्ट्री को चौंका दिया. उन्होंने समाज के सबसे संवेदनशील और नजरअंदाज किए गए विषय पर फिल्म बनाने का फैसला किया. ऐलान होते ही डिस्ट्रीब्यूटर्स घबरा गए और उन्हें चिट्ठियां लिखकर इस जोखिम से पीछे हटने की सलाह दी. सबको डर था कि यह फिल्म बुरी तरह फ्लॉप होगी. लेकिन चोपड़ा साहब अपने फैसले पर अडिग रहे. उन्होंने कहानी को सामाजिक संदेश के साथ पेश किया और अंत को असरदार बनाया. रिलीज के बाद फिल्म ने न सिर्फ शानदार सफलता हासिल की, बल्कि सोच बदलने का काम भी किया.
नई दिल्ली. फिल्मी दुनिया में अक्सर वही कहानियां सुरक्षित मानी जाती हैं, जो दर्शकों को बिना चौंकाए मनोरंजन दे सकें. लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब एक दिग्गज निर्माता-निर्देशक बीआर चोपड़ा ने इस परंपरा को तोड़ने की ठान ली. उन्होंने समाज के उस हिस्से को केंद्र में रखा, जिसे लोग देखना तो दूर, स्वीकार करना भी नहीं चाहते थे. जैसे ही इस विषय पर फिल्म बनाने की घोषणा हुई, इंडस्ट्री में हलचल मच गई. डिस्ट्रीब्यूटर्स तक घबरा गए और चिट्ठियां लिखकर चेतावनी देने लगे- ऐसी कहानी पर फिल्म बनाना जोखिम भरा है.’ हर कोई यही मान रहा था कि ये फैसला करियर पर भारी पड़ सकता है. लेकिन उस फिल्मकार ने डरने के बजाय अपनी कहानी पर भरोसा रखा. उन्होंने ना सिर्फ विषय को संवेदनशीलता से पेश किया, बल्कि अंत को भी ऐसा मोड़ दिया, जिसने समाज को आईना दिखा दिया. रिलीज के बाद जो हुआ, उसने सभी आशंकाओं को गलत साबित कर दिया. कौन सी है ये फिल्म चलिए बताते हैं…
फिल्म निर्माता-निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा यानी बीआर चोपड़ा भारतीय सिनेमा के उन दिग्गज फिल्मकारों में से एक थे, जिन्होंने मनोरंजन के साथ गंभीर सामाजिक मुद्दों को जोड़ा. उनका पूरा सिने करियर सामाजिक सरोकारों, सार्थक कहानियों और साहसिक विषयों से भरा रहा. भले ही वे इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी फिल्में और टीवी सीरियल ‘महाभारत’ आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं.
बीआर चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल 1914 को लाहौर (अविभाजित भारत) में हुआ था. उन्होंने लाहौर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया. वह फिल्म समीक्षा लिखते थे और कहानियां भी लिखा करते थे. साल 1955 में उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस ‘बीआर फिल्म्स’ स्थापित किया. उनकी फिल्में हमेशा सामाजिक संदेश देती थीं. ‘नया दौर’ (1957) में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला के साथ उन्होंने मजदूर-पूंजीपति के संघर्ष को दिखाया. ‘गुमराह’, ‘कानून’, ‘हमराज’, ‘निकाह’, ‘कर्म’ जैसी फिल्मों ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया. उनकी आखिरी फिल्म ‘भूतनाथ’ रही. साल 1998 में उन्हें भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के अवार्ड मिला.
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साल 1958 में आई बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘साधना’ उनके साहस और साधना की सबसे बड़ी मिसाल है. फिल्म की कहानी वेश्या की जिंदगी और उसके पुनर्वास पर आधारित थी. मुख्य किरदार चंपा (वैजयंतीमाला) एक वेश्या थी, जो एक कॉलेज लेक्चरर मोहन (सुनील दत्त) से प्यार करती है. फिल्म में समाज की वेश्याओं के प्रति सोच और उन्हें मुख्यधारा में लाने का मुद्दा उठाया गया था. फिल्म की घोषणा होते ही इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया. डिस्ट्रीब्यूटर चोपड़ा साहब को चिट्ठी लिखकर कह रहे थे, ‘आप क्या कर रहे हैं? हम सब मर जाएंगे.’
इस बात का जिक्र उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में किया था कि फिल्म निर्माण कई लोगों ने उन्हें समझाया कि वेश्या की कहानी पर फिल्म पहले भी बनी हैं और सब फ्लॉप हो गई हैं. न्यू थिएटर्स की ‘नर्तकी’, वाडिया की ‘राज नर्तकी’, विजय भट्ट की ‘पूर्णिमा’ और मुंशी प्रेमचंद की ‘सेवा सदन’ पर बनी फिल्में असफल रहीं. एक डिस्ट्रीब्यूटर ने सीधे पूछा – ‘चार फिल्में फ्लॉप हो चुकी हैं, आपको क्या लगता है ये चलेगी?’ चोपड़ा साहब ने शांत भाव से जवाब दिया, ‘जब मैंने अपनी पहली फिल्म बनाई थी, तब भी मुझे नहीं पता था कि वो चलेगी या नहीं. मुझे कहानी अच्छी लगी, इसलिए बनाई. ये भी अच्छी लगी, इसलिए बना रहा हूं.’
मूल कहानी में अंत अलग था-वेश्या मंदिर में उपदेश सुनकर बदल जाती थी लेकिन चोपड़ा साहब को ये सामाजिक कोण खत्म करने वाला लगा. उन्होंने लेखक पंडित मुखराम शर्मा से कहा कि अंत ऐसा होना चाहिए जिसमें मां अपनी बेटी का हाथ पकड़कर कहे- ‘तुम इस घर में बहू बनकर आई थी, वेश्या बनकर बाहर नहीं जा सकती.’ यही अंत रखा गया.
फिल्म रिलीज हुई तो मराठा मंदिर में महिलाओं की भीड़ लग जाती थी. इंटरवल में चोपड़ा साहब जब ऊपर जाते, तो आंसू रोक नहीं पाते. फिल्म ने वेश्या की कहानी को न सिर्फ दिखाया बल्कि उसे सम्मान और पुनर्वास का संदेश दिया. ‘औरत ने जनम दिया मर्दों को’ गीत साहिर लुधियानवी का आज भी प्रासंगिक है.
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