Friday, 17 April 2026
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अमिताभ बच्चन के 7 कालजयी डायलॉग, जिस दोस्त ने लिखे, उसी से टूटी दोस्ती, फिर नहीं देखी एकदूजे की शक्ल


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Amitabh Bachchan 10 Iconic Dialogues : बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को मेगा स्टार बनाने में इंडस्ट्री के कई लोगों का हाथ है. महमूद, प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई, यश चोपड़ा और सलीम-जावेद का नाम विशेष रूप से लिया जाता है. अमिताभ बच्चन को मेगा स्टार उनकी किस्मत, शालीनता और अनुशासन ने भी बनाया, मगर एक ऐसा शख्स भी जिसने पर्दे के पीछे रहकर अमिताभ की मदद की. उनके लिए आइकॉनिक डायलॉग लिखे. डायलॉग बोलने का तरीका सिखाया. उर्दू जुबान सिखाई. तकदीर का खेल देखिए उसी जिगरी दोस्त से अमिताभ बच्चन की दोस्ती टूट गई. कौन है वो ‘जादूगर’ जिसने पर्दे के पीछे से अमिताभ बच्चन की किस्मत को सुनहरी रंग दिया.

बॉलीवुड के जाने-माने डायरेक्टर-प्रोड्यूसर प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘जंजीर से 1973 में अमिताभ बच्चन की किस्मत ने पलटा खाया. वो रातोंरात सुपर स्टार बन गए. फिर दीवार-शोले जैसी फिल्मों ने उनका स्टारडम बॉलीवु में स्थापित कर दिया. अमिताभ अनुशासित-शालीन तो पहले से ही बस उन्हें मनमोहन देसाई-प्रकाश मेहरा और यश चोपड़ा की फिल्मों का साथ मिला तो वो स्टारडम के शिखर पर पहुंच गए. अमिताभ बच्चन को स्टारडम दिलाने में एक और शख्स का बहुत बड़ा हाथ है. ये वो शख्स है जो पर्दे पर के पीछे कलम की जादूगरी से अमिताभ बच्चन के लिए डायलॉग लिखता था. डायलॉग लिखकर, उन्हें कैसे बोलना है, यह भी बताता था. हम बॉलीवुड की लीजेंड एक्टर-राइटर कादर खान की बात कर रहे हैं. अमिताभ बच्चन को सफलता के शीर्ष पर पहुंचाने में कादर खान ने अहम योगदान दिया. अमिताभ के लिए कालजयी डायलॉग लिखे.

‘हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है’ जैसे कालजयी डायलॉग ही महानायक अमिताभ बच्चन की पहचान हैं. फिल्म का नाम भले ही याद ना हो लेकिन डायलॉग अमर हो गए. इन वन लाइनर डायलॉग को लिखने वाला शख्स अमिताभ बच्चन का जिगरी दोस्त जैसा था. प्यार से उन्हें अमित बुलाता था. जी हां! कादर खान ने अमिताभ बच्चन की कई सुपरहिट फिल्मों के डायलॉग लिखे. इनमें अमर अकबर एंथोनी, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, कुली, शराबी, नमक हलाल, कालिया जैसी फिल्में शामिल हैं. आइये एक नजर अमिताभ बच्चन के इन कालजयी डायलॉग और फिल्मों के दिलचस्प फैक्ट्स पर डाल लेते हैं……

कादर खान ने 1972 में फिल्म जवानी दीवानी (1972) से एक राइटर के रूप में बॉलीवुड में डेब्यू किया था. कादर खान ने 70 के दशक में अमिताभ बच्चन की चर्चित फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के कालजयी डायलॉग लिखे थे. अमिताभ बच्चन की ‘अमर अकबर एंथनी’ (1977) में एक से बढ़कर एक डायलॉग्स कादर खान ने ही लिखे थे. एक डायलॉग तो आपको याद ही होगा जब अमिताभ बच्चन बोलते हैं :’ऐसा तो आदमी लाइफ में दो ही टाइम भागता है, ओलंपिक रेस हो या पुलिस का केस हो…तुम काहे में भागता है भाई?’ यह एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी.

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1978 में रिलीज हुई ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म का यह डायलॉग तो आपने जरूर सुना होगा जिसे कादर खान बोलते हैं : ‘जिंदा हैं वो लोग जो मौत से टकराते हैं, मुर्दों से बदतर हैं वो लोग जो मौत से घबराते हैं. सुख को ठोकर मार, दुख को अपना. सुख तो बेवफा है, चंद दिनों के लिए आता है और चला जाता है. दुख, दुख तो अपना साथी है. अपने साथ रहता है. दुख को अपना ले. तकदीर तेरे कदमों में होगी और तू मुकद्दर का बादशाह होगा.’ इसी फिल्म का एक और डायलॉग काफी फेमस हुआ था. वो डायलॉग है : ‘जिंदगी का अगर सही लफ्ज उठना है… तो मौत से खेलो.’ 1 करोड़ के बजट में बनी इस मूवी ने 8.5 करोड़ का कलेक्शन किया था. 70 के दशक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म में शुमार है.

अगले ही साल 1979 में अमिताभ की एक और फिल्म ‘मिस्टर नटवर लाल’ आई थी. इस फिल्म के एक सीन में अमिताभ भगवान से बात करते हैं. कादर ने जो डायलॉग लिखे, वो दर्शकों के जेहन में बस गए. अमिताभ कहते हैं, ‘आप हैं किस मर्ज की दवा, घर में बैठे रहते हैं, ये शेर मारना मेरा काम है? कोई मवाली स्मग्लर हो तो मारूं मैं शेर क्यों मारूं, मैं तो खिसक रहा हूं और आपमें चमत्कार नहीं है तो आप भी खिसक लो.’ इसी तरह 1982 में रिलीज हुई नमक हलाल (1982) मूवी के फनी इंग्लिश डायलॉग को भला कौन भुला सकता है. अमिताभ से फिल्म के एक सीन में रंजीत पूछते हैं : ‘तुम्हें इंग्लिश भी आती है?’, जवाब में अमिताभ कहते हैं, ‘अरे बाबूजी ऐसी इंग्लिश आवे, दैट आई कैन लीव अंग्रेज बिहाइंड!’

टीनू आनंद की एक फिल्म ‘कालिया’ 1981 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म का एक डायलॉग हिंदी सिनेमा के इतिहास के सुनहरे पन्ने में दर्ज है. वैसे तो इस डायलॉग को पहले विलेन का रोल करने वाले बॉब क्रिस्टो बोलते हैं लेकिन जब इसी संवाद को अमिताभ बच्चन अपनी स्टाइल में बोलते हैं कि ‘हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है’ तो दर्शक तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं. वैसे तो इस फिल्म के डायलॉग टीनू आनंद के पिता इंदर राज आनंद ने ही लिखे थे लेकिन यह वन लाइनर कादर खान ने लिखा था. कादर खान ने इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के ब‌ड़े भाई की भूमिका निभाई थी. फिल्म कितनी बड़ी हिट हुई, आप सभी जानते हैं.

साल 1982 में ही अमिताभ की एक और शानदार फिल्म ‘सत्ते पे सत्ता’ आई थी. इस फिल्म का क्रेज आज भी है. अगर यह फिल्म टीवी पर आ रही हो तो लोग चैनल नहीं बदलते. फिल्म के एक डायलॉग में अमिताभ छा जाते हैं. इस डायलॉग को कादर ने ही लिखा था. एक सीन में अमिताभ अमजद खान के साथ शराब पी रहे होते हैं. वो कहते हैं ‘दारू पीता नहीं है अपुन, क्योंकि मालूम है दारू पीने से लीवर खराब हो जाता है, लीवर.’

1983 में आई ‘कुली’ फिल्म को कोई भी सिनेप्रेमी नहीं भुला सकता. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन का पुनर्जन्म हुआ था. पुनीत इस्सर ने गलती से अमिताभ के पेट में मुक्का इसी फिल्म के एक फाइट सीक्वेंस में मार दिया था. अमिताभ को महीनों अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था. पूरे देश में उनकी सलामती के लिए दुआएं मांगी गई थीं. मनमोहन देसाई के निर्देशन में बनी इस फिल्म के डायलॉग कादर खान ने ही लिखे थे. फिल्म में वो मेन विलेन भी थे. फिल्म के एक सीन में दोनों का आमना-सामना होता है. कादर खान के हाथ में पिस्टल होती है तो अमिताभ कहते हैं, ‘तेरे हाथ में मौत का सामान है तो…मेरे सीने पे खुदा का नाम है.’ इसी फिल्म का एक और आइकॉनिक डायलॉग कादर खान की कलम से निकला था. यह डायलॉग था : ‘मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मजदूरी मिल जानी चाहिए जनाब.’

इसी तरह 1984 में प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘शराबी’ में भी अमिताभ बच्चन के दमदार डायलॉग कादर खान ने लिखे थे. कादर खान ने ही अमिताभ बच्चन को उनके करियर के शानदार डायलॉग दिए. इसी फिल्म का एक डायलॉग ‘मूंछें हों तो नत्थू लाल जैसी हों…वर्ना ना हों’ अमर हो गया. एक्टर मुकरी की अमर पहचान बन गया. जब भी यह डायलॉग कोई बोलता है, मुकरी का चेहरा आंखों के सामने तैरने लगता है. 1990 की एक और कल्ट मूवी ‘अग्निपथ’ के डायलॉग भी कादर खान ने ही लिखे थे. इस फिल्म के एक डायलॉग ‘विजय दीनानाथ चौहान, पूरा नाम विजय दीनानाथ चौहान, बाप का नाम, दीनानाथ चौहान, मां का नाम, सुहासिनी चौहान, गांव मांडवा, उम्र 36 साल.’ को कोई कैसे भूल सकता है. कादर खान मेगा स्टार अमिताभ को अमित कहकर बुलाते थे. एक वक्त ऐसा भी आया जब उन पर अमिताभ को सर कहने का दबाव डाला गया. कादर खान ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. फिर क्या था, इतने वर्षों की दोस्ती ‘गुरूर’ की भेंट चढ़ गई.

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