Friday, 17 April 2026
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Bhooth Bangla Movie Review: प्रियदर्शन के जादुई पिटारे से निकली एक अनोखी कहानी


नई दिल्ली. बॉलीवुड में जब भी कॉमेडी की बात होती है तो प्रियदर्शन का नाम हमेशा दिमाग में आता है. कल्ट क्लासिक ‘भूल भुलैया’ देने के बाद, जब उन्होंने ‘भूत बंगला’ के लिए अक्षय कुमार, परेश रावल और राजपाल यादव की तिकड़ी को एक साथ लाने का फैसला किया तो उम्मीदें स्वाभाविक रूप से बहुत ज्यादा थीं. यह फिल्म सिर्फ एक हॉरर-कॉमेडी नहीं है, बल्कि उस दौर की याद दिलाती है जब कॉमेडी बॉडी लैंग्वेज और सिचुएशनल टाइमिंग पर निर्भर करती थी. मंगलपुर की रहस्यमयी गलियों में सेट, यह कहानी एक ऐसा सफर है जो आपको डराने से ज्यादा हंसाता है, लेकिन एक सस्पेंस आखिर तक बना रहता है.

कहानी
फिल्म मंगलपुर नाम के एक काल्पनिक शहर से शुरू होती है, जहां ‘आचार्य निवास’ नाम की एक बड़ी हवेली है. कहानी एक पुश्तैनी जायदाद के इर्द-गिर्द बुनी गई एक पारिवारिक सेलिब्रेशन पर केंद्रित है. अक्षय कुमार का किरदार एक ऐसे आदमी का है जो अनजाने में इस हवेली के रहस्यों में उलझ जाता है. शुरू में सब कुछ नॉर्मल और मस्ती-मजाक से भरा लगता है, लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती है, हवेली की दीवारें बोलने लगती हैं. फिल्म की कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब पता चलता है कि हवेली में परछाई किसी पुरानी रंजिश या अधूरी इच्छा से जुड़ी है. प्रियदर्शन ने कहानी को इस तरह बुना है कि हर किरदार किसी रहस्य से जुड़ा हुआ लगता है. यह हॉरर के टच के साथ एक शानदार मिस्ट्री भी है.

एक्टिंग
फिल्म की कहानी के साथ-साथ स्टार कास्ट इसकी बैकबोन हैं. अक्षय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब कॉन्फिडेंस के साथ कॉमेडी की बात आती है, तो उनका कोई मुकाबला नहीं है. उनकी एनर्जी असरदार है. डरावने सीन में भी, उनका मजेदार अंदाज फिल्म के भारीपन को कम करने में मदद करता है. वहीं, परेश रावल की डायलॉग डिलीवरी और चेहरे के एक्सप्रेशन फिल्म के सबसे बड़े हाई प्वाइंट हैं. जब भी वह स्क्रीन पर आते हैं, एक अजीब सा माहौल बना देते हैं. उनका कन्फ्यूजन दर्शकों के लिए हंसी का सोर्स है. राजपाल यादव फिल्म का सरप्राइज पैकेज हैं. उनके छोटे-छोटे पल और उनके डरे हुए रिएक्शन फिल्म में जान डाल देते हैं. अक्षय और राजपाल के बीच की नोकझोंक आपको ‘भूल भुलैया’ और ‘दे दना दन’ के पुराने दिनों की याद दिला देगी, जबकि दूसरे एक्टर्स ने भी मंगलपुर के रहने वालों के तौर पर बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है, जो फिल्म के रहस्यमयी माहौल को और बढ़ा देती है, खासकर दिवगंत अभिनेता असरानी.

डायरेक्शन
प्रियदर्शन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे एक ही फ्रेम में इतने सारे कैरेक्टर्स को रखकर भी उथल-पुथल को खूबसूरती से मैनेज कर पाते हैं. ‘भूत बंगला’ में उन्होंने सस्पेंस और ह्यूमर के बीच जो बैलेंस बनाया है, वह तारीफ के काबिल है. वे दर्शकों को डराने के लिए सिर्फ हॉरर सीन पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि कैमरा एंगल्स और कैरेक्टर्स की घबराहट से डर पैदा करते हैं. उनका डायरेक्शन इस बात पर जोर देता है कि कॉमेडी सिर्फ डायलॉग्स में नहीं, बल्कि सिचुएशन्स में होनी चाहिए.

सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसे एक शानदार फील देती है. हवेली के अंदर के सीन, लंबी परछाईं और मंगलपुर की धुंधली गलियां बहुत अच्छे से शूट की गई हैं. रात के सीन में नीली और पीली रोशनी का कंट्रास्ट एक डरावना लेकिन दिलचस्प माहौल बनाता है.क्लोज-अप शॉट कैरेक्टर के डर को दिखाते हैं, जबकि हवेली के वाइड शॉट उसकी बड़ी जगह और उसमें छिपे अकेलेपन को दिखाते हैं.

म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर
म्यूजिक की बात करें तो फिल्म के गाने कहानी की रफ्तार में रुकावट नहीं डालते. गाने जोशीले हैं और उनमें थोड़ा नॉस्टैल्जिक फील है, जो फिल्म के एंटरटेनर टैग को सही ठहराता है. वहीं, सही मायने में देखा जाए तो बैकग्राउंड स्कोर ही फिल्म की असली जान है. हॉरर सीन में म्यूजिक की धीमी, ग्रूवी बीट्स रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं, जबकि वही म्यूजिक कॉमेडी सीन में अचानक जोशीला हो जाता है. साउंड डिजाइन को बहुत ध्यान से बनाया गया है, जिससे हवेली की हर आवाज असली लगती है.

कमियां
अपनी खूबियों के बावजूद, फिल्म में कुछ कमियां भी हैं. फिल्म थोड़ी लंबी है, इसलिए फिल्म का दूसरा हाफ कई बार थोड़ा खिंचा हुआ लगता है. अगर इसकी लंबाई थोड़ी कम होती तो शायद इसकी स्पीड बहुत अच्छी होती. वहीं, फिल्म के कुछ सीन और क्रिस्प हो सकते थे. अगर आप बहुत डरावनी फिल्म ढूंढ रहे हैं, तो आप थोड़े निराश हो सकते हैं. यहां हॉरर सिर्फ कॉमेडी को सपोर्ट करने के लिए है, उस पर पूरी तरह हावी होने के लिए नहीं.

अंतिम फैसला
‘भूत बंगला’ एक ऐसी फिल्म है, जो हंसाते हुए डराती है और डराते हुए हंसाती है. यह अक्षय कुमार के फैंस के लिए एक शानदार ट्रीट है और उन लोगों के लिए एक तोहफा है जो प्योर फैमिली एंटरटेनमेंट ढूंढ रहे हैं. प्रियदर्शन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि असली स्वाद पुराने चावल में है. यह फिल्म थिएटर में देखने लायक है, क्योंकि यह जो कलेक्टिव हंसी का एक्सपीरियंस देती है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 4 स्टार.



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